Saturday, May 9, 2015

तुम्हें प्रणाम

उन कठोर चट्टानों को तोड़ कर वे रास्तो के निर्माण में व्यस्त थे
मै कार पे सवार उन रास्तो पे चली जा रही थी
पहाड़ों के मोहक नजारों का लुफ्त उठाने
बर्फ के सफ़ेद चादरों को देखकर मन बहलाने
ऊपर ऊपर कुछ और ऊपर , वाह क्या दृश्य है
फिर कार को रोक कर मै उन रास्तों पे उतरी
चाहती थी उन छटाओं को उन वादियों को कैमरे में उतारना
चंद ही पल में सांसें फूलने सी लगी थी
काँपने लगी थी रूह तक रक्त जमने लगा था
मै दौड़ती हुई कार मैं प्रवेश कर चुकी फिर
चल पडी गाड़ी मंजिल अभी और ऊपर थी
अब मुझे इन नजारो के साथ दिखने लगी वो सुंदरता
जो छिपी थी उन मजदूरो के कर्मठता में
जो छिपी थी उनकी जीवन की कटुता में
अब मुझे दिखने लगा एक और खूबसूरत नजारा
जो छिपी थी उन वर्दी वाले प्रहरियों के जज़्बे में
दया की दृष्टि से नहीं मै उन्हे प्रेरणा की दृष्टि से देख रही थी
वो सीखा रहे थे मुझे बाधाओं से लड़ना और मै सीख रही थी
सब कुछ बड़ा सुंदर सा लग रहा था
मै मन ही मन उनके कृतज्ञ हो चली थी
उन्होने ही तो मुझे उन उच्च चोटियों तक पहुँचने का मार्ग दिया है
मै उनको बार बार शुक्रिया कह रही थी
कोटी कोटी प्रणाम तुम्हें मेरा हृदय कर रहा था
हे मजदूर वर्ग हे सेनानियो तुमपे गर्व सा हो रहा था ।




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