Friday, March 10, 2017

Meri kavita

मेरी कविता मुझसे होके गुजरती है, हर वक़्त से जो वाकिफ़ है , हर रंग से संवरती है, कभी सुबह की रोशनी सी हर जर्रे पे बिखरती है तो कभी रात की चाँदनी सी सबके दिल में उतरती है....... मेरी कविता मुझसे होके गुजरती है.....

मैंने अपने ही कविता को बदलते हुए देखा है, जीवन के हर कदम से कदम मिलाके चलते हुए देखा है, कभी धूप में बर्फ सा पिघलते हुए देखा है, तो कभी चुपचाप शाम की तरह ढलते हुए देखा है....... मैंने अपनी ही कविता को बदलते हुए देखा है...........

मैंने माना है मेरी कविता सबसे खास है, इसमे जीने की आस है, इसमे एक दृढ़ विश्वास है, इसमे जुनून है, पागलपन है, सच की तलाश है...... मैंने माना है मेरी कविता सबसे खास है.....

मेरी कविता अभी पूरी नहीं अधूरी है, क्यौकी कई पंक्तियां और जुडनी जरूरी है, इसमे कई खामियाँ है जो इसकी मजबूरी है, पर फिर भी ये अपने आप में अधूरी होके भी पूरी है...... मेरी कविता अब भी जारी है इसलिए अधूरी है.........

मेरी कविता जारी है........ जारी है.... जारी है......

                                                                 प्रियंका.........

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