बस एक
चुटकी राख़
बस एक चुटकी राख़ की रह
जाती है ।
वह भी तो जल की धार संग बह
जाती है ।
शेष फिर क्या रह जाता रे
मनुज तेरा ?
जिसके लिए तू मरता है जीवन
सारा ।
तेरा किया करा भी संग तेरे
कहाँ जाता रे ?
तेरा प्रिय था जो वो भी उस
घाट से लौट आता रे ।
तेरी जमा पूंजी को घेरे
तेरे प्रिय फसाद रचते ,
देख तेरे राख़ के ठंड होने
तक को भी न रुकते ।
क्या इस घड़ी के लालसा मे
तू जीवन भर जला है ?
देख कैसे इस यथार्थ ने
तुझको आज छला है ।
कैसा रे तेरा अभिमान आज
माटी मे जा मिला है ।
देख सत्य की लीला ने
मिथ्या जीवन को यू कुचला है ।
देख तेरी राख़ जल मे बहती
हुई जाती है ।
घुल के जल मे खोते वक़्त भी
कुछ कहती हुई जाती है ।
रे मनुज मै माटी हूँ , तू मुझसे निर्मित प्रतिमा है ।
रे मनुज मै सत्य तेरा तू
केवल मात्र कल्पना है ।
हो कृतज्ञ तू उस कुम्हार
का जो तुझको गढ़ देता है ।
अहम है मिथ्या, सत्य ब्रह्म है , ये प्रमाणित कर देता है ।

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