Friday, May 15, 2015

बस एक चुटकी राख़

बस एक चुटकी राख़
बस एक चुटकी राख़ की रह जाती है ।
वह भी तो जल की धार संग बह जाती है ।

शेष फिर क्या रह जाता रे मनुज तेरा ?
जिसके लिए तू मरता है जीवन सारा ।

तेरा किया करा भी संग तेरे कहाँ जाता रे ?
तेरा प्रिय था जो वो भी उस घाट से लौट आता रे ।

तेरी जमा पूंजी को घेरे तेरे प्रिय फसाद रचते ,
देख तेरे राख़ के ठंड होने तक को भी न रुकते ।

क्या इस घड़ी के लालसा मे तू जीवन भर जला है ?
देख कैसे इस यथार्थ ने तुझको आज छला है ।

कैसा रे तेरा अभिमान आज माटी मे जा मिला है ।
देख सत्य की लीला ने मिथ्या जीवन को यू कुचला है ।

देख तेरी राख़ जल मे बहती हुई जाती है ।
घुल के जल मे खोते वक़्त भी कुछ कहती हुई जाती है ।

रे मनुज मै माटी हूँ , तू मुझसे निर्मित प्रतिमा है ।
रे मनुज मै सत्य तेरा तू केवल मात्र कल्पना है ।

हो कृतज्ञ तू उस कुम्हार का जो तुझको गढ़ देता है ।
अहम है मिथ्या, सत्य ब्रह्म है , ये प्रमाणित कर देता है ।









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